“मुझे नहीं चाहिए आज़ादी!”

राम कुछ कह नहीं पा रहा था पर सब समझ रहा था। उसने अपने बाबा से कहा, “बाबा, मुझे नहीं चाहिए आज़ादी|” आखिर  क्या हुआ जो राम ने ऐसा कहा?

 

आज राम के भाई को शहीद हुए एक साल हो गया। अपने भाई को याद करते हुए दस साल के रामेश्वर ने अपने पिता से पूछा, “बाबा, ये आज़ादी क्या है? क्यों बड़े भैया उसके लिए शहीद हो गये। मुझे भी आज़ादी चाहिए।” तब  राम के बाबा ने कहा, “आज मैं तुम्हें एक कहानी सुनाऊँगा। आज़ादी की। पर अभी नहीं शाम को।” और, वो अपना झोला उठाए बाहर चले गये।

उसी दिन अंग्रेज़ों की गोली उन्हें शहीद कर गयी। और राम…..

राम उनका इंतज़ार करते-करते सो गया। उसने एक सपना देखा जिसमें वो अपने बाबा से मिला। वो उनसे चिपक गया। ज़िद कर बोला, “अब मैं आपको कहीं नहीं जाने दूँगा।”

उसके बाबा ने कहा, “जाना तो होगा, लेकिन मैं तुम्हें कहानी सुनाने आया हूँ। दिखाने आया हूँ कि आज़ादी कैसी होगी।”

“चलो भविष्य में चलते हैं।”

“क्यों ना वर्ष 2020 में चलें। तब तक तो मेरा देश बहुत विकास कर चुका होगा।”

राम की नम आँखे अचानक चमक सी उठीं।

वो चले और जैसे ही वो भविष्य में आए मानो कोई सपना सच हुआ हो। सब तरफ चमक थी।

राम ने देखा चारों तरफ सुंदर खिलौने थे। सभी ने सुंदर-सुंदर कपड़े-जूते पहने थे। उसने कल्पना भी नहीं की थी कि सब इतना सुंदर हो सकता है। नया-नया खाने का समान था। सब कुछ कहानियों जैसा था। इतनी बड़ी-बड़ी सड़कें थीं। उस पर सरपट दौड़ रही गाड़ियाँ। एक पूरा दिन निकलने को था।

राम और उसके बाबा को यकीन ही नहीं हुआ कि वो अपने देश में खड़े है। तभी पीछे से किसी ने आवाज़ दी, “दिखाई नहीं देता है क्या?” वो सड़क के बीच में थे और इतनी भीड़ मे कुछ समझ नहीं आ रहा था। अचानक देखा सामने वाली सड़क पर कोई खून में लथपथ पड़ा है। उन्होंने भाग के देखा तो सब उसके चारों तरफ खड़े होकर हाथ मे छोटा सा कोई यंत्र ले कर उसकी तरफ देख रहे थे। राम ने बाबा से पूछा, “ये इसको उठा क्यूँ नहीं रहे हैं बाबा?” बाबा ने कहा, “बेटा ज़रूर इस यंत्र मे कोई शक्ति होगी। देखो कितने सारे लोग मदद कर रहे हैं।”  राम को कहीं से एक और तेज़ आवाज़ आई और वो भाग गया। तब तक राम के बाबा ने देखा कि वो आदमी वहीं मर गया है और अब भी कोई उसे नहीं उठा रहा। वे उसकी मदद करने और कुछ भी समझ पाने में असमर्थ थे। फिर वो राम के पीछे भागे।

अभी भी दुविधा और सोच मे पड़े थे राम के बाबा। इससे पहले कि कुछ और सोच पाते, देखा एक बड़ी सी गाड़ी में एक परिवार बैठा था। बाहर चार छोटे बालक, थोड़े ग़रीब घर के थे शायद, उनसे खाना माँग रहे थे। लेकिन उस परिवार ने उन्हें डाँट कर भगा दिय। ये देख कर राम ने फिर से पूछा, “बाबा, आज़ादी ने इन नन्हे बालकों को खाना क्यूँ नहीं दिया? मैं इन्हें अपने साथ ले जाऊँगा।” राम के बाबा विचलित हो उठे।

आगे बढ़े, देखा लड़के-लड़कियाँ सब सुंदर से कपड़े पहन के स्कूल जा रहे है। उनका मन बहुत खुश हुआ कि मेरे देश की बेटियाँ भी अब पढ़-लिख कर अपने पैरों पर खड़ी होंगी। लेकिन उन्होंने देखा कुछ लड़के, लड़कियों को परेशान कर रहे थे और कोई लड़कियों की मदद नहीं कर रहा था। उनका बस चलता तो जाने क्या कर बैठते। एक तरफ जहाँ ये देख कर उनका खून खौल गया वहीं दूसरी तरफ वो हताश हो गये। कहाँ इस उम्र के लड़के-लड़कियाँ अपने देश के लिए शहीद हो गए, और आज यहाँ, आज़ादी मिलने के बाद ये युवा पीढ़ी इतनी संकीर्ण हो गयी?

अब राम इतनी सुंदर खाने की वस्तु देख अचम्भित था। राम के बाबा ने देखा सब चॉक्लेट, केक जैसी चीज़ें खा रहे हैं। जब उन्होंने देखा कि ये सब सेहत के लिए सिर्फ़ और सिर्फ़ हानिकारक हैं तो वो पूरी तरह से टूट गये। अपने हरे-भरे देश में कटे पेड़, ग़रीबी, आतंक और बिना किसी औचित्य के जीते जीवन देख कर बस अब वो वापिस जाना चाहते थे। राम कुछ कह नहीं पा रहा था पर सब समझ रहा था। उसने अपने बाबा से कहा, “बाबा मुझे नहीं चाहिए आज़ादी। यहाँ कोई किसी से बात भी नहीं करता। सब भागते रहते हैं।” राम के बाबा ने खुद को संभाला और कहा, “अगर तुम चाहते हो कि ऐसा ना हो तो तुम्हें कोशिश करनी होगी। छोटी से छोटी कोशिश से सब बदल सकता है। तुम अपने दोस्तों  को जा कर बताना कि हम बहुत आगे बढ़ सकते हैं। सबको शिक्षा मिलेगी। अच्छे कपड़े मिलेंगे। और भी सब बताना।” इतना कहते-कहते वो रुक गये और सोचने लगे की आज का ये दुर्भाग्यपूर्ण मानव तो अपनी कमज़ोरियों का ही गुलाम हो गया है और नम आँखे लिए कहीं ओझल हो गये।

राम की नींद टूटी और वो रोने लगा। उसकी माँ ने उसे गले लगाया और कहा, “नहीं  बेटा, बाबा शहीद हुए हैं। हमें आज़ादी मिले इसीलिए वो शहीद हुए हैं। रोते नहीं हैं।” राम ने कुछ न कहा। किसी से भी। बस अपनी माँ से चिपक गया पर वो आज़ादी के लिए नहीं लड़ा…..

 

http://www.womensweb.in/2018/09/meaning-of-azaadi-hindi/

 

 

 

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Seven b&w photo: day 4

कैसा लगता है तुमको जब किसी को समझ नहीं आता है

क्या चाह रहे हो तुम ..क्या कहने को कोशिश है ..

कोई तुम्हारे शब्दो को पढ़ नहीं पाता है

अपना सबसे प्यारे खिलोने को गले लगते हो

या मम्मी की किसी चीज़ को फेंक आते हो

पापा की गोद मे छिपजाते हो या..

किसी के पास आने से कतराते हो..

पैर पटक पटक कर रोते हो या किसी पलंग के नीचे छिप जाते हो

अपने सबसे प्यारे दोस्त के पास भाग जाते हो या दादी से शिकायत कर आते हो..

कितना मुश्किल होता है ये बचपन भी.

तुम रोते हो तो कभी तो कोई गले से लगता है और कभी और भी गुस्सा हो जाता है

कोई तुम्हारी बोली नहीं समझता ..

समझ सकती हूँ क़ि कितना गुस्सा आता है..

जब आप कहते कुछ हो और माँ पापा को कुछ और ही समझ आता है..

I would like to nominate Vartika Vartikasdiary.wordpress.com to start b&w post.. but no pressure:)

वो माँ भी थी !!

आज कुछ नही लिखना और शायद लिख भी नहीं सकूँगी| कोई कहानी नहीं कोई कविता नहीं..आज एक सोच है जिसे लिख कर शायद मेरा मन हल्का हो जाए..सुबह ही एक नर्स “लीनी” या कहूँ कि एक वीरांगना के बारे में पढ़ा जो मरीज़ों का निपाह इलाज करते हुए शहीद हो गयी..और क्या नाम दूं मैं इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना को..मैं नहीं जानती कि निपाह कौन सी ऐसी बीमारी है जिससे पिछले 48 घंट मे 10 से भी ज़्यादा लोगो ने अपनी जान गावा दी है ..पर वो जानती थी..
वो सिर्फ़ 31 साल की थी ..माँ भी थी वो ..कैसे इतनी हिम्मत की होगी उन्होने कि अपना स्वार्थ भूल कर औरों के लिए लड़ गयीं वो .इस बार वो मौत से लड़ रही थी..
उसे पता भी चल गया था कि अब समय आ गया है ..उसने एक चिट्ठी लिखी अपने पति के नाम.
क्या उसके मन में नहीं आया होगा की लिख दे वो सब कुछ जो भी अपने परिवार को कहना चाहती है अपने पति को कि खाना समय पर खाना रुमाल ले जाना मत भूलना.कौन क्या ख़ाता है..छोटा बेटा रोएगा तो कैसे संभालना है .दोनों बच्चे ज़िद करेंगे तो कैसे चुप करना है .खाने मे मिर्च कितनी कम ज़्यादा करनी है .किसी भी बात से ना माने तो क्या दे कर बहलाना है.स्कूल यूनिफॉर्म कब धोनी है |गर्म पानी से नहलाना है या ठंडे से. ..कितने बजे सुलाना है ..
कब उठाना है.रात को कौन सी कहानी सुनानी है ..

आज पहली बारआँखें इतनी नाम हैं ..पर ये लिखने में भी मेरा ही स्वार्थ है की मेरा मान हल्का हो जाए कैसे भी|
जहाँ मेरे जैसे लोग भी हैं जो हर छोटी बात से परेशन हो जाते हैं..वहाँ ऐसे भी लोग हैं जो अपने परिवार और बच्चों के लिए भी सब कुछ खुशी खुशी करते हैं और साथ में समाज के लिए भी..
उन्हें बहाने बनाने नही आते ..आता है तो बस सबको प्यार करना ..सबका ध्यान रखना .
आप जहाँ भी होंगी ,मैं जानती हूँ कि उस जगह को बेहतर बना ही लेंगी ..काश कि मैं एक बस जा के आपके बच्चों को देख पाती और उन्हें कह पाती की उनकी माँ बहुत बहुत बहादुर थी |

https://www.thebetterindia.com/142436/kerala-nurse-lini-parting-letter-husband-nipah-virus-fatality/?fb=organic

##RIPAngelLini 

 

 

Seven B&W Photos : Day 3

कुछ शून्य सा कुछ कतरा जैसा..
मैं बस मैं हूँ..
और मैं नहीं हूँ तेरे जैसा ..
मैं क्यों समझाऊं उन्हें जो मुझे समझना नहीं चाहते ..
मैं क्यों बहलाऊं उन्हें जो मुझे सुनना भी नहीं चाहते

मैं जीने आया हूँ और जी रहा हूँ..
ये मेरा जीवन तुम क्यू बनाना चाहते हो..
महज़ एक तमाशा जैसा..
शून्य हूँ मैं .. सिफ़र हूँ मैं
जो भी हूँ बस यही हूँ मैं
और मैं खुश हूँ..

औरों को खुश करूँगा जब मैं करना चाहूँगा
औरो को समझौँगा भी लेकिन जब मैं समझना चाहूँगा
एक एक पल अनमोल है मेरे जीवन का
यदि तुम ना समझो…
तो सब कुछ बस…
रहने दो अब वैसा ही ,सालों से है जैसा ||

This is written for a wonderful friend @Sifar , whom I have never met , never seen but I can connect so well.This is for you my dear..hope you like it.No nomination for this one .Thisis only for youSifar

Seven B&W Photo : Day 2

अपनी खिड़की पर बैठी वो अक्सर आते जाते लोगों को देखती रहती थी पर पूरे दिन वो इंतेज़ार करती थी गुब्बारे वाले का .रंग बिरंगे गुब्बारे ले कर जब वो गली में आता था, तो  मुहल्ले के सारे बच्चों के चेहरे पर मुस्कुराहट आ जाती थी..वो भी खुशी से खिल जाती थी.आँखों में मानो कोई चमक आ गयी हो|

पता नहीं, ऐसा क्या था इस पल में, कि वो सब कुछ भूल कर उसमें खो जाती थी.वो अलग अलग रंगो के गुब्बारे मानो कई सपने ले कर आते थे.. उड़ते हुए यहाँ वहाँ फुदकते हुए सपने..

एक दिन शाम हो गयी पर गुब्बारे ले कर कोई नहीं आया.

वो खिड़की पर आती और हर बार निराश हो कर वापिस चली जाती.

रात हो गयी . आज वो नहीं आया. वो एक पल, जिसका वो पूरा दिन इंतज़ार करती थी .. आज नही आया..

अरे!ये क्या? अगले दिन सुबह सुबह घंटी बजाते हुए गुब्बारे वाला आया है .अरे वाह!आज तो कई आकार के गुब्बारे हैं | गली में ऐसे गुब्बारे पहले किसी ने नहीं देखे थे| फिर क्या था, बच्चों की भीड़ लग गयी.

इतना शोर सुनकर वो खिड़की की तरफ भागी. उसके चहरे की खुशी देखने लायक थी| आज गुब्बारे वाला उसकी खिड़की पर आया और पूछा:

“कौन सा गुब्बारा चाहिए बिटिया” ?

वो बोली” नहीं नहीं. मैं क्या करूँगी गुब्बारे का बाबा..चाची कहती हैं” ये गुब्बारे सपनों की तरह होते टूटने वाले सपने. मुझे नही चाहिए..

गुब्बारे वाले ने पूछा “और माँ क्या कहती है”

अचानक उसकी वो आँखों की चमक कहीं ओझल सी हो गयी. वो बोली “माँ तो नहीं है”ये कहकर वो अंदर भाग गयी|

गुंबरे वाला थोड़ी देर तक खिड़की से उसे देखता रहा और फिर एक गुब्बारा वहीं खिड़की पर बाँध कर चला गया.

 साथ में एक कागज भी लगा गया,जिस पर लिखा था:

“सपने टूटने के डर से सपने देखना नहीं छोड़ाकरते लाडो

           तुम्हारी माँ”..

गुब्बारा मिलते ही मानो उसे दुनिया का सबसे बड़ा ख़ज़ाना मिल गया हो|और वो कागज,वो कागज उसने आज भी संभाल के रखा है.

 

I would like to nominate Vishal Dutia “https://jalvisquotes.wordpress.com/” to continue this challenge with 7 B&W photos ..no force  .ThanksIMG_0125

Seven B&W Photos: Day 1

Thank you Sifar https://mybrokenwords.wordpress.com/ , for nominating me for this challenge.It is a pleasure for me . I will try my best to complete this challenge and make you proud;)

कुछ पुराने घरों की दीवारें हैं..
                            जो सब संभाले हुए है..
वो खोई हुई सी यादें..
                           और ये नयी सोच..
वो भूले बिसरे रिश्ते ..
                       और कुछ नये दोस्त ||
Day 1

 

I would like to nominate Madhusudan Singh https://madhureo.wordpress.com/  for using your great creativity as per your convenience.

 

 

 

Savitri : More than Just a wife

Savitri

 

आज वट सावित्री की पूजा की जाती है.माना जाता है कि आज के ही दिन सावित्री ने यमराज से अपने पति के प्राण बचा लिए थे.

उसे पढ़ते पढ़ते मेरे मन में कई बार बहुत सारे सवाल आए.अगर इस कथा को सच मान लिया जाए,

तो क्या ये वास्तविकता में संभव है कि किसी की इच्छा शक्ति से काल को भी हार माननी पड़ी हो.

सावित्री के व्यक्तत्व को समझा जाए तो वो स्वाभिमानी , स्वतंत्र विचार वाली और द्रढनिर्णय लेने में समर्थ महिला रहीं होन्गि.उन्हे ये पता था की उन्हें क्या और किस तरह प्राप्त करना है जो कि एक जीवन में इतना आसान नहीं है.आज की युवा पीढ़ी इस सवाल में खोई रहती है कि वो क्या चाहते हैं |

सावित्री को अपना जीवन साथी चुनने की आज़ादी थी और भविष्य जानते हुए भी वो अपने निर्णय पर अडिग रहीं. उनके पिता ने उन्हें समझने की कोशिश की थी पर अंत में उनके निर्णय का सम्मान किया .कहीं ना कहीं वो भी अपनी बेटी के मन को पढ़ पाए होंगे |

समझा जाए तो उस सदी में भी लड़कियों को अपना जीवन साथी चुनने की स्वतंत्रता थी.

अगर इस एक बात की आज के समय से तुलना की जाए तो मुझे ऐसा लगता है किहम बहुत पीछे आ गये हैं . प्रोग्रेसिव सोच की बात करना और सच मे उसपर अमल करने मे बहुत अंतर है.

क्या कारण रहा होगा की आज के माता पिता अपने बच्चों की पसंद को 80% स्थिति मे सही नही मानते,और अधिकतर तो अपना जीवन साथी खुद चुनना भी बहुत परिवारों मे अपराध ही माना जाता है.

आप भी सोचिएगा की इसमे हम पीछे क्यू रह गये.किस जगह हमारा समाज इतना ग़लत हो गया की हम अग्रसर सोच को आगे बढ़ने की जगह कहीं पीछे ले गये.

आगेबात करते हैं सावित्री की .शादी हुई और उनको पता था की उनके पास 1 साल है.उसके बाद जाने क्या सोच के बैठी थी सावित्री.कुछ ऐसा करना चाहतीं थी जो कभी नही हुआ था,और शायद उसके बाद भी कभी नही हुआ.

पर उन्हें विश्वास था | खुद पर और शायद अपने ईश्वर पर.

1 साल पूरा हुआ तो सावित्री भी अपने पति के साथ काम पर निकल गयी.जैसा नारायण जी ने भविष्यवाणी की थी वैसा हुआ भी.यमराज आए और सावित्री के पति के प्राण ले कर चल दिया.

और फिर वो हुआ जिसके बारे मे यमराज ने भी कभी नही सोचा होगा.

सावित्री भी पीछे पीछे चल दी.कितनी गणनात्मक थी और बहुत ही समझदार  भी |

सावित्री ने अपनी ज़िद से,अपनी सूझ बूझ से यमराज से बहुत सारे वरदान भी ले लिए.

अब मैं ये सोचने पर मजबूर हो गयी की जब किसी के सामने ऐसी स्थिति हो तो कैसे वो इतना सूझ बूझ के साथ सबसे पहले अपने पति की जान नही माँग सकता .

उन्होने 3 वरदान माँगे थे.

पर पहले दो वरदानों मे उन्होने अपने सास ससुर की आँखें और राज पाठ और दूसरे में अपने माता पिता के लिए पुत्र माँगे.मतलब उनको अपनी तर्क शक्ति और निपुणता पर इतना अधिक विश्वास था की तीसरे वर में उन्होंने अपने लिए पुत्र माँगे और फिर यमराज को उनके पति के प्राण वापिस करने पड़े.

इस 15 मिनिट की कथा को पढ़ते पढ़ते 15000 प्रश्न मेरे मन में आ गये.

ऐसा क्या सिखाया होगा उस छोटी सावित्री को उसके माता पिता ने किबड़ी हो कर वो अपने निर्णय एवम अपने हर तर्क मे इतनी ज़्यादा स्पष्ट थी कि उनको क्या और कैसे मिलेगा.कैसे कोई इतना धीरज रख सकता है जब इतनी भावुक परिस्थिति  उनके सामने हो | अपने हर भाव को हर स्थिति को संतुलित करने की कथा है ये|

पतिवृता सावित्री को हमेशा याद किया जाता है कि उन्होने अपना पति धर्म निभाया .पर सावित्री ने तो एक बेटी होने का धर्म उससे भी अच्छे तरीके से निभाया है.इतनी मुश्किल परिस्थिति मे भी उन्होने अपने माता पिता के बारे मे पहले सोचा .

मैं सच मे नहीं जानती ये सच है या नही पर सावित्री किसी के लिए भी एक प्रेरणा स्त्रोत  है.

हम आज के समय मे बहुत बात करते हैं की बेटियो को पढ़ाओ, स्वतंत्र बनाओ.

बहुत ज़रूरी है की हम ये समझ पाए की सही निर्णय लेना सीखना भी बहुत बहुत ज़रूरी है .उनको बचपन से ही ये आज़ादी देना की तुम अपने निर्णय लो.ग़लती होगी ,सीखोगे पर वो बहुत ज़रूरी है.

कई सालों से मैं सावित्री के बारे मे सुनती और पढ़ती आ रही हूँ पर आज मुझे सच मे ये मौका मिला की मैं उनको बारे मे समझ सकूँ |

आपकी राय जानने के लिए उत्सुक रहूंगी |

Mera samaan

#lostluggage #Rashmi #Inked

मेरा सामान खो गया है

एक बस्ता और कुछ किताबें ..

मेरे स्कूल के जूते और स्कूल ना जाने के बहाने ..

एक पेन्सिल जिसमें पीछे रबर लगी थी

और कुछ रंग जिनसे मैंअपनी आत्मा से जुड़ी थी

माँ बाबा भी कहीं खो गये हैं

या मानो जैसे सब चोरी हो गये हैं

अब रह गयी है ये अजीब सी जगह ..

और

जहाँ हर दिन कोई आता है ..

और मुझे थोड़ा और छीन कर ले जाता है

मेरे सब खिलोने भी खो गये हैं

और अब सपने भी नहीं आते

पता नहीं क्यूँ यहाँ ..

जब चोट लगे तो गले लगाने कोई नही आता

और मुझे यहाँ का कोई भी रिवाज़ समझ नहीं आता

कुछ कहो तो यहाँ की मासी बहुत मारती है..

आपको मिला क्या मेरा सामान..

काश की मैं अपने घर जा सकती

सच अब मैं कभी बहाना नहीं बनौँगी

बस माँ के पास पहुँचा दो मुझे

फिर मैं हर रोज़ स्कूल जाउन्गी !!

वो चाय का प्याला !

वो चाय का प्याला मेरे लिए सिर्फ़ चाय नहीं
कई पल भी ले कर आता है.
हर बार हर एक चुस्की में..
तुम्हें थोड़ा और जान पाने का …
सुरूर भी तो छोड़ जाता है..
वो जो अदरक के साथ हर बार छिप कर,
तुम अपना थोड़ा सा प्यार भी छिड़क देते हो ना
वो मुझे तुमसे और ज़्यादा प्यार करने की..
गुज़ारिश सी फरमाता है..
कई बार मेरा भी मन तो करता है
तुम्हारी पसंद की वो काली वाली कॉफी बनाने का..
पर अलमारी में उसी के साथ रखी..
मेरी वो चाय की पत्ती ..
हर बार मुझे अपनी बातों मे उलझा लेती है
तुम तो जानते हो ना वो इतनी भी सीधी नहीं है ..
वो देर रात चाय का प्याला लिए,
जब हम अपनी खिड़की से बाहर देखते हैं..
तो सपने बोलने लगते हैं और तुम्हारी हर धड़कन
एक ग़ज़ल सी सुनाई देती है
बस जब मैं खोई होती हूँ अपनी इस दुनिया में ..
जाने कब तुम मेरे प्याले की भी चाय पी जाते हो..
पर यही तो पल हैं जो मैं संजो रही हूँ..
तभी तो चाय का प्याला मेरे लिए सिर्फ़ चाय नहीं ..
कई पल भी ले कर आता है..
और हुमारी ज़िंदगी में हर बार थोड़ाऔर प्यार घोल जाता है

इरादा मिल गया

खोया सा हुआ था कहीं.

वो इरादा मिल गया

गुम सी हुई उस कश्ती को..

अपना किनारा मिल गया…

बरसों से जो खुद की तलाश में निकले थे हम..

आज अपनी ही खुदी से दोस्ती का,

वो एहसास दोबारा मिल गया..

कुछ कर गुज़रने का जज़्बा

कुछ साबित कर जाने की चाहत

कुछ पा जाने का जुनून..

खुद का ही हाथ पकड़ ,अपना ही सहारा बनने की आदत..

तेरी दर्द भारी आँखो मे ,

मुझे अपना भी हल्का सा साया मिल गया..

हर मुश्किल से लड़ने का जज़्बा एक बार ,

दोबारा मिल गया ..